जहां पहले नक्सल हिंसा में खून बहता था वहां अब खेली जा रही रंग-गुलाल की होली, बस्तर की बदली तस्वीर
जीवन में कभी उत्सव, खुशियां और रंगों के लिए कोई जगह नहीं थी, आज वहीं लोग होली जैसे रंगों के त्योहार में पूरी तरह सराबोर दिखाई दे रहे हैं
छत्तीसगढ़ में माओवाद खात्मे की ओर है। ऐसे में पूरे प्रदेश में जो जगह कभी नक्सल हिंसा के लिए कुख्यात थे, अब वहां भी खुशियों के रंग भर रहे हैं। जिस जीवन में कभी उत्सव, खुशियां और रंगों के लिए कोई जगह नहीं थी, आज वहीं लोग होली जैसे रंगों के त्योहार में पूरी तरह सराबोर दिखाई दे रहे हैं। नक्सल हिंसा में प्रभावित ग्रामीण जीवटता की मिसाल बन रहे हैं। वहीं कई जगह आत्मसमर्पित नक्सली मुख्यधारा से जुड़कर समाज में शांति और विकास में सहायक बन रहे हैं। खेती-किसानी से लेकर स्कूलों और सरकारी कार्यालयों में लोगों की सेवा कर रहे हैं। मेहनत और सही मार्गदर्शन से ये सफलता की नई इबारत लिख रहे हैं। रंगों के इस त्योहार पर इनकी सफलता की कहानी प्रेरक है।
विध्वंसक कहलाते थे, मुख्य धारा में लौटे तो बन गए सृजनकर्ता
जगदलपुर के जंगल में थे तो सिर्फ खून-खराबा करते थे। विध्वंसक कहलाते थे। अब जब हथियार छोड़ मुख्य धारा में लौटे तो पहचान बदल गई। अब हर कोई उन्हें हुनरमंद सृजनकर्ता कह रहा है। हाथ कभी खून से रंगे थे पर अब हुनर से जीवन में रंग भर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं बस्तर संभाग में सरेंडर करने वाले नक्सलियों की। सरेंडर नक्सलियों के जीवन को बदलने का बस्तर में अभियान चल रहा है।
आत्मसमर्पण के बाद वे जो करना चाहते हैं या जिस काम में उनका मन लगता है वह उन्हें सिखाया जा रहा है। बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा में 90-90 के बैच में नक्सलियों को हुनरमंद बनाया जा रहा है। इस काम के लिए एक विशेष स्कूल तैयार किया गया है। आईटीआई और लाइवलीहुड के माध्यम से आत्मसमर्पित नक्सलियों को अलग-अलग तरह के काम सिखाए जा रहे हैं। कोई राज मिस्त्री का काम सीख रहा है तो कोई कारपेंटर का। पेंटिंग, सिलाई-बुनाई जैसे काम भी सिखाए जा रहे हैं। वहीं निरक्षर लोगों को साक्षर भी बनाया जा रहा है।
… तो सामने आई बदलाव की तस्वीर
बस्तर में नक्सलवाद का गढ़ कहे जाने वाले बीजापुर जिले की पहचान सिर्फ लाल आतंक के रूप में होती है। अब जब नक्सली हथियार छोड़कर वापस लौट रहे हैं तो सरकार भी उनके लिए बहुत कुछ कर रही है। इसके पीछे एक ही सोच है कि बेरोजगारी की वजह से वे वापस उसी दलदल में ना चले जाएं। लाल आतंक का दायरा सिमटने के बाद बदलाव की तस्वीर सामने आ रही है। इस पूरे प्रोजेक्ट के तहत एक स्पेशल ट्रेनिंग कैंप तैयार किया गया है।
सुबह 5 बजे योग से होती है शुरुआत
कौशल विकास ट्रेनिंग कैम्प में 90 नक्सलियों को पहले चरण में ट्रेंड किया जा रहा है। सुबह 5 बजे योग के साथ दिन की शुरुआत होती है। इसके बाद दिनभर अलग-अलग तरह के कामों की ट्रेनिंग दी जाती है। साक्षर भारत कार्यक्रम के तहत पढ़ाई भी करवाई जाती है। टीवी देखने का समय भी तय किया गया है ताकि वे देश-दुनिया में चल रही गतिविधि को जान सकें। शाम का वक्त खेल-कूद के लिए तय रखा गया है।
जिन हाथों से कभी लगाते थे बम ..अब सीख रहे खेती-किसानी
ट्रेनिंग सेंटर में ऐसे नक्सली भी अपना जीवन बदल रहे हैं जो नक्सल संगठन में बम लगाने से लेकर हथियार बनाने तक का काम करते थे। ऐसे समर्पित नक्सली अब खेती-किसानी के गुर सीख रहे हैं। मवेशी पालन, मछली पालन जैसी चीजें भी सीख रहे हैं। इसके अलावा उन्हें एक्सपोजर विजिट भी करवाया जा रहा है। अलग-अलग जिलों के संस्थानोंम जाकर वे विशेष कामों को करीब से देख रहे हैं।
अभी ट्रेनिंग दे रहे फिर भी रोजगार भी देंगे
बीजापुर एसपी डॉ. जितेंद्र यादव ने कहा कि राज्य सरकार की पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमॢपत नक्सलियों को कौशल विकास प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद उन्हें प्लेसमेंट के जरिए रोजगार भी उपलब्ध करवाया जाएगा। इस प्राजेक्ट की वजह से वे अपने पिछले स्याह जीवन की यादों को भुलाकर जीवन में रंग भर रहे हैं।
कबीरधाम में पुनर्वास मॉडल बना मिसाल
कवर्धा में कभी बंदूक थामे जंगलों में सक्रिय रहीं कबीरधाम जिले की सात पूर्व महिला नक्सलियों की जिंदगी अब पूरी तरह बदल चुकी है। शासन की पुनर्वास और पुनःउत्थान नीति के तहत आत्मसमर्पण के बाद इन महिलाओं को मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास रंग ला रहे हैं। आत्मसमर्पण करने वाली महिलाओं में से रनिता अब पुलिस विभाग में सहायक आरक्षक के पद पर कार्यरत हैं।
वर्दी पहनकर कानून-व्यवस्था संभालना उनके जीवन का नया अध्याय है। वहीं तीन अन्य महिलाएं अपने घर से सिलाई और कढ़ाई का काम कर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। पुलिस विभाग द्वारा उनसे वर्दी सिलवाने का कार्य लिया जा रहा है, जिससे उन्हें नियमित आय का स्रोत मिला है। शेष तीन महिलाएं भी परिवार के साथ सामान्य जीवन व्यतीत कर रही हैं और सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी निभा रही हैं। प्रशासन का मानना है कि रोजगार से जुड़ाव ही स्थायी पुनर्वास की कुंजी है।
बंदूक ने बदला था रास्ता, अब पूरी की अधूरी पढ़ाई
धमतरी में कल तक जिन हाथों में विकास को रोकने वाली बंदूकें थी। आज उन्हीं हाथों में बच्चों का भविष्य संवारने और व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने की जिम्मेदारी है। हम बात कर रहे हैं पूर्व नक्सली दिनेश्वरी नेताम और बिरनबती की। इन्होंने 2014-15 में धमतरी में सरेंडर किया। नक्सल पुनर्वास नीति के तहत दिनेश्वरी को जिले के एक सरकारी छात्रावास और बिरनबती को जिले के एक स्कूल में प्यून की नौकरी मिली है।
दिनेश्वरी ने जब हथियार थामी तब कक्षा-6वीं तक पढ़ी थी। सरेंडर के बाद ओपन स्कूल परीक्षा के तहत 12 वीं पास की और अपनी अधूरी शिक्षा पूरी की। दिनेश्वरी का कहना है कि अब वह सुरक्षित और महफूज जीवन जी रही है। उनकी दो बेटियां हैं। बिरनबती ने कहा कि जंगल के कठिन रास्ते से 2015 में लौटी और अब सम्मानजनक जीवन जीते हुए परिवार-समाज में खुशियों का रंग भर रही है।
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