खारुन नदी में अवैध डंपिंग पर बवाल, पर्यावरण नियमों के उल्लंघन का आरोप
मानवाधिकार आयोग ने की सख्त कार्रवाई की मांग, 7 दिन में कार्रवाई नहीं होने पर NGT जाने की चेतावनी
रायपुर। राजधानी की प्रमुख जलधारा खारुन नदी के अस्तित्व पर एक बार फिर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। नदी में खुलेआम निर्माण मलबा डाले जाने के आरोपों को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण आयोग ने गंभीर आपत्ति जताई है और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग उठाई है।
आयोग के प्रदेश महासचिव प्रदुमन शर्मा ने छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल के क्षेत्रीय अधिकारी को लिखित शिकायत सौंपते हुए आरोप लगाया है कि कुम्हारी स्थित पुराने पुल की मरम्मत के दौरान ठेकेदार द्वारा निर्माण सामग्री और मलबा निर्धारित डंपिंग स्थल के बजाय सीधे नदी में डाला जा रहा है।
शिकायत में यह भी कहा गया है कि इस पूरे मामले में NH-PWD विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की कथित लापरवाही और मिलीभगत सामने आ रही है, जिससे पर्यावरणीय नियमों की खुलेआम अनदेखी हो रही है।
प्रदुमन शर्मा ने इसे गंभीर पर्यावरणीय अपराध करार देते हुए कहा कि यह कृत्य सर्वोच्च न्यायालय और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के दिशा-निर्देशों का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने बताया कि पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम 1986 और निर्माण एवं विध्वंस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 के तहत नदी क्षेत्र में मलबा डालना दंडनीय अपराध है।
उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की गतिविधियां न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं, बल्कि नागरिकों के संविधान प्रदत्त स्वस्थ जीवन के अधिकार का भी हनन कर रही हैं।
आयोग ने मांग की है कि संबंधित ठेकेदार पर भारी आर्थिक दंड लगाया जाए, उसका लाइसेंस तत्काल निरस्त किया जाए तथा 48 घंटे के भीतर नदी में डाले गए मलबे को हटाकर नदी को मूल स्वरूप में बहाल किया जाए। इसके साथ ही निगरानी में लापरवाही बरतने वाले विभागीय अधिकारियों के खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाए।
आयोग ने प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि सात दिनों के भीतर संतोषजनक कार्रवाई नहीं की गई, तो यह मामला नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और मानवाधिकार आयोग के समक्ष उठाया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी संबंधित विभागों की होगी।
फिलहाल इस मामले ने पर्यावरण संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
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