जाति प्रमाण-पत्र जारी करने का अधिकार सिर्फ एसडीएम को, हाईकोर्ट ने स्पष्ट की प्रक्रिया

जाति प्रमाण-पत्र जारी करने का अधिकार सिर्फ एसडीएम को, हाईकोर्ट ने स्पष्ट की प्रक्रिया

तहसीलदार के समक्ष दिए आवेदन को नहीं माना सक्षम प्रक्रिया, बिलासपुर की याचिकाकर्ता को 30 दिन में एसडीएम के पास नया आवेदन प्रस्तुत करने की अनुमति

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि राज्य में जाति प्रमाण-पत्र जारी करने का वैधानिक अधिकार केवल अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) यानी एसडीएम को है। जस्टिस पी.पी. साहू की एकलपीठ ने कहा कि तहसीलदार इस संबंध में सक्षम प्राधिकारी नहीं हैं। कोर्ट ने बिलासपुर की एक याचिकाकर्ता को आवश्यक दस्तावेजों के साथ 30 दिनों के भीतर एसडीएम के समक्ष नया आवेदन प्रस्तुत करने की छूट देते हुए नियमानुसार शीघ्र निर्णय लेने के निर्देश दिए हैं।

बिलासपुर। बिलासपुर के राजकिशोर नगर निवासी शैली सोनकर ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर जाति प्रमाण-पत्र जारी करने के निर्देश देने की मांग की थी। उनका कहना था कि उन्होंने तहसीलदार, बिलासपुर के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया था, जहां प्रकरण दर्ज कर प्रक्रिया भी प्रारंभ की गई, लेकिन लंबे समय बाद भी प्रमाण-पत्र जारी नहीं किया गया।

राज्य सरकार ने कोर्ट में रखा पक्ष

सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से अदालत को बताया गया कि छत्तीसगढ़ में जाति प्रमाण-पत्र जारी करने का अधिकार केवल अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) को प्राप्त है। शासन ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने ऐसा कोई रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया, जिससे यह साबित हो सके कि उन्होंने सक्षम अधिकारी के समक्ष आवेदन किया था।

कानून और शासन के निर्देशों का हवाला

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि छत्तीसगढ़ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग (सामाजिक स्थिति के प्रमाणीकरण का विनियमन) अधिनियम, 2013 तथा 24 सितंबर 2013 को जारी राज्य शासन के परिपत्र के अनुसार जाति प्रमाण-पत्र जारी करने का अधिकार एसडीएम को ही प्राप्त है। इसलिए तहसीलदार के समक्ष प्रस्तुत आवेदन को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष आवेदन नहीं माना जा सकता।

30 दिन में नया आवेदन देने की छूट

अदालत ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए निर्देश दिया कि वे 30 दिनों के भीतर सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ सक्षम अधिकारी (एसडीएम) के समक्ष नया आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं। साथ ही संबंधित अधिकारी को निर्देशित किया गया कि आवेदन प्राप्त होने के बाद प्रचलित नियमों और कानून के अनुरूप उसका परीक्षण कर यथाशीघ्र निर्णय लिया जाए।

व्यवस्था पर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

इस फैसले के माध्यम से हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि जाति प्रमाण-पत्र जारी करने की प्रक्रिया में अधिकार क्षेत्र का पालन अनिवार्य है। न्यायालय के इस आदेश से भविष्य में ऐसे मामलों में सक्षम प्राधिकारी के समक्ष ही आवेदन प्रस्तुत करने की प्रक्रिया और अधिक स्पष्ट हो गई है।