एक छत के नीचे दिखेगी 12 राज्यों की जनजातीय विरासत, रायपुर में आज से ‘आदि बाजार’
टाउन हॉल में 2 नवंबर तक चलेगी प्रदर्शनी; कोसा सिल्क, ढोकरा कला, गोंड पेंटिंग, संबलपुरी साड़ी और बांस-बेंत के उत्पाद होंगे खास
रायपुर। हस्तनिर्मित वस्तुओं, पारंपरिक परिधानों और जनजातीय कलाकृतियों में रुचि रखने वालों के लिए राजधानी में विशेष आयोजन होने जा रहा है। टाउन हॉल में 24 अक्टूबर से राष्ट्रीय जनजातीय प्रदर्शनी एवं बिक्री मेला ‘आदि बाजार 2026’ शुरू होगा। भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन विकास परिसंघ (ट्राइफेड) की ओर से आयोजित यह मेला 2 नवंबर तक चलेगा।
मेले का शुभारंभ शनिवार शाम 5 बजे जनजातीय विकास मंत्री रामविचार नेताम करेंगे। कार्यक्रम में रायपुर की महापौर मीनल चौबे और छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ की प्रबंध संचालक संजीता गुप्ता विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल होंगी।
छत्तीसगढ़ की कला से लेकर पूर्वोत्तर के शिल्प तक
प्रदर्शनी में अलग-अलग राज्यों की पहचान बन चुके पारंपरिक उत्पादों को एक ही स्थान पर देखने और खरीदने का अवसर मिलेगा। छत्तीसगढ़ के कोसा सिल्क और ढोकरा शिल्प के साथ ओडिशा की संबलपुरी साड़ी तथा सौरा पेंटिंग प्रदर्शित की जाएंगी। मध्यप्रदेश की बाघ प्रिंट, माहेश्वरी साड़ी और गोंड चित्रकला भी मेले की शोभा बढ़ाएंगी।
पश्चिम बंगाल की कांथा कढ़ाई, राजस्थान के पारंपरिक परिधान और झारखंड के जूट उत्पादों के जरिए विभिन्न क्षेत्रों की हस्तकला की झलक देखने को मिलेगी। वहीं, पूर्वोत्तर राज्यों के बांस-बेंत से बने सामान तथा उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बांस उत्पाद भी उपलब्ध रहेंगे। अराकु कॉफी भी मेले में आने वाले लोगों के लिए खास आकर्षण होगी।
पारंपरिक हुनर को मिलेगा प्रोत्साहन
जनजातीय समुदायों के अनेक उत्पाद स्थानीय परंपराओं, प्राकृतिक संसाधनों और पीढ़ियों से चले आ रहे कौशल पर आधारित होते हैं। ऐसे उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने के उद्देश्य से ‘आदि बाजार’ जैसे आयोजन किए जाते हैं। इससे शिल्पकारों को अपने उत्पादों का प्रदर्शन करने, ग्राहकों से सीधे संपर्क बनाने और बिक्री के नए अवसर हासिल करने में मदद मिल सकती है।
मेले में 12 राज्यों के करीब 80 कारीगर 40 स्टॉलों के माध्यम से अपनी कला प्रस्तुत करेंगे। आयोजन के जरिए जनजातीय संस्कृति, पारंपरिक ज्ञान और हस्तनिर्मित उत्पादों के प्रति लोगों की रुचि बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।
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