महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने के दोषी की सजा बरकरार

हाईकोर्ट ने आरोपी की अपील खारिज की, सुसाइड नोट और परिजनों की गवाही को माना अहम आधार; चार सप्ताह में ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का निर्देश

महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने के दोषी की सजा बरकरार

बिलासपुर। महिला को आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आरोपी बाबली सिंह उर्फ बबलू उर्फ बोध सिंह की अपील खारिज कर दी है। जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकलपीठ ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई पांच साल की सश्रम कैद और दो हजार रुपए जुर्माने की सजा को सही ठहराया है। अदालत ने आरोपी को चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का निर्देश दिया है।

सिनेमा हॉल में खाया था जहर

अभियोजन के अनुसार, 24 मई 2013 को मंजू शर्मा ने रायपुर के 36 सिटी मॉल स्थित सिनेमा हॉल में सल्फास खा लिया था। उन्हें उपचार के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर मेमोरियल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उनकी मौत हो गई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जहर के कारण हृदय और श्वसन संबंधी समस्याओं को मौत का कारण बताया गया। फॉरेंसिक साइंस लैब (एफएसएल) की जांच में भी विसरा के नमूनों में एल्युमिनियम फॉस्फाइड की पुष्टि हुई।

सुसाइड नोट की लिखावट की हुई जांच

पुलिस ने मृतका के पर्स से सुसाइड नोट, सल्फास की पुड़िया, फोटो और पहचान पत्र बरामद किए थे। राज्य एफएसएल के हस्तलेखन विशेषज्ञ ने दस्तावेजों पर लिखावट और हस्ताक्षरों का परीक्षण किया। जांच में सभी दस्तावेजों की लिखावट एक ही व्यक्ति की होने की पुष्टि हुई। अदालत ने इस रिपोर्ट को मामले के महत्वपूर्ण साक्ष्यों में शामिल माना।

मां ने कोर्ट में बताई थी प्रताड़ना की बात

मृतका की मां ने गवाही में बताया था कि घटना से दो-तीन महीने पहले उनकी बेटी ने आरोपी द्वारा प्रताड़ित किए जाने और बेटे को अगवा करने की धमकी दिए जाने की जानकारी दी थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि एक बार आरोपी ने दुकान में उनकी बेटी को कुर्सी से पीटा था।

दूसरी ओर, आरोपी ने दलील दी कि मृतका का वैवाहिक जीवन तनावपूर्ण था और उसने पहले भी आत्महत्या की कोशिश की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने सुसाइड नोट, विशेषज्ञ की रिपोर्ट और गवाहों के बयानों को देखते हुए इन दलीलों को दोषसिद्धि समाप्त करने के लिए पर्याप्त नहीं माना।

कोर्ट ने कहा, लगातार प्रताड़ना के थे साक्ष्य

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह मामला केवल सामान्य विवाद या किसी एक घटना तक सीमित नहीं था। सुसाइड नोट में लगातार प्रताड़ित किए जाने और गंभीर धमकियां मिलने का उल्लेख था। परिजनों की गवाही से भी इन आरोपों को समर्थन मिला। अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर आरोपी के व्यवहार और महिला की आत्महत्या के बीच संबंध माना।

कोर्ट ने यह भी कहा कि हर विवाद या प्रताड़ना को आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं माना जा सकता। इसके लिए आरोपी की मंशा, उसके आचरण और आत्महत्या के बीच संबंध का प्रमाण आवश्यक है। इस मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के तहत दोषसिद्धि को उचित माना।

चार सप्ताह में करना होगा सरेंडर

हाईकोर्ट ने आरोपी को चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण कर सजा भुगतने का निर्देश दिया है। निर्धारित अवधि में सरेंडर नहीं करने पर ट्रायल कोर्ट उसे हिरासत में लेकर सजा भुगतने की कार्रवाई करेगा।