मां बम्लेश्वरी के नाम के पीछे क्या है कहानी, चार मान्यताओं में छिपे हैं अलग-अलग जवाब

विक्रमादित्य और माधवानल-कामकंदला की गाथा, गोंड समुदाय की परंपरा, राजपरिवार से जुड़ा विवरण और प्रदीप मिश्रा की व्याख्या बताती हैं मंदिर की अलग-अलग मान्यताएं

मां बम्लेश्वरी के नाम के पीछे क्या है कहानी, चार मान्यताओं में छिपे हैं अलग-अलग जवाब

रायपुर। डोंगरगढ़ स्थित मां बम्लेश्वरी मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों से चली आ रही लोककथाओं और मान्यताओं का भी महत्वपूर्ण स्थल है। मंदिर के नाम की उत्पत्ति कैसे हुई, देवी का मूल स्वरूप क्या था और पहाड़ी पर उनकी स्थापना किस तरह हुई, इन सवालों के जवाब अलग-अलग कथाओं में मिलते हैं। एक मान्यता राजा विक्रमादित्य की आराधना और माधवानल-कामकंदला की प्रेमगाथा से जुड़ती है। दूसरी में गोंड समुदाय की बमलाई और समलाई का उल्लेख है। खैरागढ़ राजपरिवार से संबंधित विवरण में प्राचीन प्रतिमा, गुफा और राजा कमलनारायण का प्रसंग सामने आता है। वहीं, पंडित प्रदीप मिश्रा ने भगवान शिव के डमरू से निकले ‘बम’ नाद के आधार पर मां के नाम की व्याख्या की। इन चारों प्रसंगों में देवी के स्वरूप और मंदिर के इतिहास को लेकर अलग-अलग धारणाएं दिखाई देती हैं।

प्रेम, संघर्ष और देवी की आराधना की कहानी

मां बम्लेश्वरी से जुड़ी लोककथाओं में माधवानल और कामकंदला की प्रेमगाथा विशेष स्थान रखती है। इस कहानी में कामाख्या नगरी की राजनर्तकी कामकंदला और संगीत के जानकार माधवानल एक-दूसरे से प्रेम करते थे। बताया जाता है कि राजा कामसेन के पुत्र मदनादित्य की रुचि भी कामकंदला में थी। प्रेम संबंध की जानकारी सामने आने के बाद माधवानल को डोंगरगढ़ की पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी।

कथा के अनुसार, उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने माधवानल की सहायता के लिए कामाख्या नगरी पर आक्रमण किया। युद्ध के दौरान कामकंदला को माधवानल की मृत्यु का समाचार मिला तो उसने तालाब में कूदकर जान दे दी। प्रेमिका की मृत्यु की खबर से माधवानल ने भी प्राण त्याग दिए।

इसके बाद विक्रमादित्य ने देवी की उपासना की। कथा के कुछ संस्करणों में देवी के प्रकट होने और प्रेमी युगल को जीवनदान देने की बात कही जाती है। लोकविश्वास के एक रूप के अनुसार, विक्रमादित्य के अनुरोध पर देवी डोंगरगढ़ की पहाड़ी पर विराजमान हुईं। इस तरह प्रेमकथा को मां बम्लेश्वरी मंदिर की उत्पत्ति से जोड़ने वाली मान्यता प्रचलित हुई।

इस आख्यान के अलग-अलग संस्करण मिलते हैं, इसलिए इसे स्थापित इतिहास के बजाय लोकपरंपरा से जुड़ी कथा के रूप में प्रस्तुत करना अधिक उपयुक्त है।