भारत ने निजी अंतरिक्ष अभियान में रचा इतिहास, पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ सफलतापूर्वक लॉन्च

स्काईरूट एयरोस्पेस ने पहले ही प्रयास में हासिल की बड़ी सफलता; श्रीहरिकोटा से 450 किमी की कक्षा में पहुंचा रॉकेट, प्रधानमंत्री ने दी बधाई।

भारत ने निजी अंतरिक्ष अभियान में रचा इतिहास, पहला प्राइवेट ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ सफलतापूर्वक लॉन्च

*भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र ने शनिवार को नई उपलब्धि हासिल करते हुए पहला स्वदेशी निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में भेज दिया। हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित इस रॉकेट का प्रक्षेपण श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया गया। पहले ही प्रयास में मिली इस सफलता को भारतीय स्पेस सेक्टर के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है।*

नई दिल्ली/श्रीहरिकोटा (ए)। निजी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत ने एक और महत्वपूर्ण कदम बढ़ाते हुए पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ सफलतापूर्वक लॉन्च कर दिया। हैदराबाद की स्टार्टअप कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित इस रॉकेट का प्रक्षेपण शनिवार दोपहर 12:05 बजे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से किया गया। लॉन्चिंग के लिए इसरो के लॉन्चपैड का उपयोग किया गया, जबकि रॉकेट का निर्माण और मिशन संचालन पूरी तरह स्काईरूट एयरोस्पेस ने किया।

यह मिशन पहले ही प्रयास में सफल रहा और विक्रम-1 पृथ्वी की लगभग 450 किलोमीटर ऊंची निम्न कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट) तक पहुंचने में सफल रहा। इस उपलब्धि को देश के निजी अंतरिक्ष उद्योग के लिए मील का पत्थर माना जा रहा है।

दो पूर्व इसरो वैज्ञानिकों ने रखी थी कंपनी की नींव

स्काईरूट एयरोस्पेस की स्थापना वर्ष 2018 में इसरो के पूर्व वैज्ञानिक एवं मित्र पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने की थी। कंपनी ने वर्ष 2022 में ‘विक्रम-एस’ नामक सब-ऑर्बिटल रॉकेट का सफल परीक्षण किया था, जिसने करीब 89.5 किलोमीटर की ऊंचाई तक उड़ान भरी थी। अब ‘विक्रम-1’ के जरिए कंपनी ने ऑर्बिटल लॉन्च क्षमता भी हासिल कर ली है।

क्या होता है ऑर्बिटल रॉकेट?

ऑर्बिटल रॉकेट वह होता है, जो पृथ्वी की कक्षा में स्थापित होने के लिए आवश्यक लगभग 28 हजार किलोमीटर प्रति घंटे (करीब 7.8 किमी प्रति सेकंड) की गति प्राप्त कर लेता है और पृथ्वी की परिक्रमा करने में सक्षम होता है।

सब-ऑर्बिटल और ऑर्बिटल में अंतर

सब-ऑर्बिटल रॉकेट अंतरिक्ष की सीमा तक पहुंचकर वापस पृथ्वी पर लौट आता है, जबकि ऑर्बिटल रॉकेट पृथ्वी की कक्षा में स्थापित होकर लगातार उसकी परिक्रमा करता है। सामान्यतः 100 किलोमीटर की ऊंचाई को अंतरिक्ष की शुरुआत माना जाता है।

'मिशन आगमन' के तहत भेजे गए कई विशेष पेलोड

इस ऐतिहासिक मिशन को ‘मिशन आगमन’ नाम दिया गया। इसके तहत कई तकनीकी और व्यावसायिक पेलोड अंतरिक्ष में भेजे गए, जिनमें ग्रह स्पेस, कॉस्मोसर्व स्पेस, डीक्यूब्ड तथा स्काईरूट एयरोस्पेस के इन-हाउस पेलोड शामिल हैं।

सोने की कलाकृति और महान वैज्ञानिकों को भी मिली अंतरिक्ष में जगह

रॉकेट के साथ 18 कैरेट सोने से बनी विशेष माइक्रो-आर्ट कलाकृति भी भेजी गई। इस पर भारत के महान वैज्ञानिक सर सी.वी. रमन, डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की सूक्ष्म आकृतियां उकेरी गई हैं। इसके अलावा ‘कॉस्मिक ब्लूम’ नामक विशेष कलाकृति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हस्तलिखित ‘वंदे मातरम्’ अंकित पोस्टकार्ड भी मिशन का हिस्सा रहा।

*प्रधानमंत्री ने दी शुभकामनाएं*

मिशन की सफलता के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्काईरूट एयरोस्पेस के संस्थापकों से फोन पर बातचीत कर उन्हें बधाई दी। उन्होंने इस उपलब्धि को भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए प्रेरणादायक और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।