सपा का बड़ा संगठनात्मक फैसला, देवेश शाक्य को एमपी–छत्तीसगढ़ की कमान

सपा का बड़ा संगठनात्मक फैसला, देवेश शाक्य को एमपी–छत्तीसगढ़ की कमान

अखिलेश यादव ने एटा सांसद को सौंपी दो राज्यों की जिम्मेदारी, ओबीसी समीकरण साधने की तैयारी

भोपाल। समाजवादी पार्टी ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की राजनीति में अपनी सक्रियता बढ़ाने की दिशा में अहम कदम उठाया है। पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश की एटा लोकसभा सीट से सांसद देवेश शाक्य को दोनों राज्यों का प्रदेश प्रभारी नियुक्त कर संगठन को नई धार देने की कोशिश की है।

अखिलेश यादव का रणनीतिक दांव

पार्टी सूत्रों के मुताबिक यह नियुक्ति केवल संगठन विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में उभरते सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को साधने की रणनीति है। देवेश शाक्य को ऐसे समय यह जिम्मेदारी दी गई है, जब सपा दोनों राज्यों में अपनी मौजूदगी को फिर से मजबूत करना चाहती है।

मध्यप्रदेश में ओबीसी वोट बैंक पर नजर

मध्यप्रदेश में शाक्य, कुशवाहा, मौर्य और सैनी समाज की राजनीतिक भूमिका लगातार बढ़ रही है। देवेश शाक्य की नियुक्ति के जरिए सपा ने ओबीसी वर्ग को स्पष्ट संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी नेतृत्व में उन्हें प्रमुख स्थान देने की नीति पर काम कर रही है। इससे भाजपा और कांग्रेस के बीच बंटे ओबीसी वोटों में सपा की हिस्सेदारी बढ़ाने की योजना मानी जा रही है।

छत्तीसगढ़ में संगठन विस्तार की चुनौती

छत्तीसगढ़ में समाजवादी पार्टी का संगठन फिलहाल सीमित है, लेकिन नई नियुक्ति के बाद वहां जमीनी स्तर पर संगठन खड़ा करने और नए नेतृत्व को आगे लाने पर फोकस किया जाएगा। पार्टी का मानना है कि सामाजिक न्याय के मुद्दों के साथ यहां भी समर्थन आधार तैयार किया जा सकता है।

मध्यप्रदेश विधानसभा में सपा की पुरानी मौजूदगी

मध्यप्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी का इतिहास पूरी तरह हाशिये पर नहीं रहा है।

1990 और 1993 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी धारा से जुड़े दलों के 10 से अधिक विधायक विधानसभा पहुंचे थे।

1998 और 2003 में यह संख्या घटकर 2–3 विधायकों तक सीमित रह गई।

2018 के विधानसभा चुनाव में सपा ने 2 सीटें जीतकर कमलनाथ सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाई थी।

2028 की राजनीति की तैयारी के संकेत

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि देवेश शाक्य की नियुक्ति को आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है। सपा नेतृत्व अब उत्तर भारत से बाहर निकलकर मध्य भारत में भी अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने की रणनीति पर आगे बढ़ता नजर आ रहा है।