UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, छात्रों और सामाजिक संगठनों ने फैसले का किया स्वागत

कोर्ट ने नियमों को बताया अस्पष्ट, कहा– दुरुपयोग की आशंका; अगली सुनवाई 19 मार्च को

UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, छात्रों और सामाजिक संगठनों ने फैसले का किया स्वागत

रायपुर,सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) द्वारा जारी किए गए नए नियमों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि नियमों के प्रावधान स्पष्ट नहीं हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने केंद्र सरकार से इस मामले में जवाब तलब करते हुए नियमों का नया ड्राफ्ट तैयार करने का निर्देश भी दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के बाद छात्रों और सामाजिक संगठनों में संतोष देखा जा रहा है।

छात्रों ने जताई राहत

बीबीए अंतिम वर्ष के छात्र विनय तिवारी ने कहा कि जिन नियमों पर रोक लगाई गई है, वे बिना पर्याप्त संवाद और सहमति के लागू किए जा रहे थे। उन्होंने आशंका जताई कि इन नियमों के तहत झूठी शिकायतों के जरिए किसी छात्र का करियर बर्बाद किया जा सकता था।

छात्र का कहना है कि नए प्रावधानों से शिक्षा व्यवस्था में भ्रम और असंतुलन की स्थिति बन रही थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से छात्रों को राहत मिली है। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की कि ऐसे नियमों पर पुनर्विचार किया जाए, जिससे किसी भी वर्ग के छात्रों को भय का माहौल न झेलना पड़े।

सामाजिक संगठनों की प्रतिक्रिया

अखंड ब्राह्मण समाज सेवा समिति के प्रदेश अध्यक्ष योगेश तिवारी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि यह कानून सवर्ण समाज के हितों के अनुकूल नहीं था और इससे छात्रों को मानसिक और सामाजिक दबाव का सामना करना पड़ सकता था। उन्होंने बताया कि इस मुद्दे को लेकर संगठन की ओर से राज्यपाल को ज्ञापन भी सौंपा गया था।

उन्होंने कहा कि अदालत द्वारा सरकार से जवाब मांगना और नियमों पर रोक लगाना एक संतुलित कदम है। संगठन को उम्मीद है कि आगे का निर्णय सभी समाजों और छात्रों के हित में लिया जाएगा।

क्या है पूरा मामला

UGC ने ‘प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूशन्स रेगुलेशन्स, 2026’ नाम से नए नियम जारी किए थे। इनका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों के खिलाफ जातीय भेदभाव को रोकना बताया गया था।

नियमों के तहत कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में विशेष समितियों, हेल्पलाइन और मॉनिटरिंग तंत्र के गठन का प्रावधान किया गया था, ताकि शिकायतों की निगरानी की जा सके।

हालांकि, सवर्ण समाज और कुछ छात्रों ने इन नियमों पर आपत्ति जताते हुए आरोप लगाया था कि जातिगत भेदभाव की परिभाषा अस्पष्ट है और इससे कॉलेज परिसरों में असंतुलन व अनावश्यक विवाद की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।