खेत का 5% हिस्सा पानी के नाम, छत्तीसगढ़ ने देश को दिखाया जल संरक्षण का मॉडल

‘जल संचय जन भागीदारी’ के तीसरे चरण में प्रदेश नंबर-1; 79,775 संरचनाएं दर्ज, 77,719 पूरीं, पांच जिले राष्ट्रीय टॉप-10 में

खेत का 5% हिस्सा पानी के नाम, छत्तीसगढ़ ने देश को दिखाया जल संरक्षण का मॉडल

रायपुर। खेत में गिरने वाली बारिश की बूंद को खेत में ही रोकने की पहल अब छत्तीसगढ़ की पहचान बनती जा रही है। जल संरक्षण में जनभागीदारी का प्रदेश का मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया है। ‘जल संचय जन भागीदारी’ अभियान के तीसरे चरण में छत्तीसगढ़ ने देश में पहला स्थान हासिल किया है। खास बात यह है कि कोरिया से शुरू हुआ किसानों की स्वैच्छिक भागीदारी का ‘5 प्रतिशत मॉडल’ भी इस अभियान की प्रमुख पहल के रूप में सामने आया।

नई दिल्ली में जल शक्ति मंत्रालय के विभागीय शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रदेश में जल संरक्षण के लिए अपनाए जा रहे तरीकों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राज्य में जल संरक्षण को सरकारी कार्यक्रम के बजाय सामूहिक अभियान बनाने पर जोर दिया जा रहा है। उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने ‘कैच द रेन’ सत्र में वर्षा जल संचयन, भू-जल पुनर्भरण और पेयजल स्रोतों के संरक्षण से जुड़े कार्यों की जानकारी दी।

किसान खुद दे रहे जमीन

कोरिया जिले का ‘5 प्रतिशत मॉडल’ इस अभियान की खास पहल है। इसमें किसान अपनी खेती की जमीन का लगभग पांच प्रतिशत हिस्सा जल संरक्षण के लिए स्वेच्छा से उपलब्ध करा रहे हैं। इस हिस्से में ऐसी संरचनाएं बनाई जाती हैं, जहां बारिश का पानी रुक सके और धीरे-धीरे जमीन में समा सके।

इस व्यवस्था में किसान केवल लाभ लेने वाले नहीं, बल्कि जल संरक्षण के सहभागी हैं। पंचायत, ग्रामीण समुदाय और संबंधित विभाग मिलकर संरचनाओं को विकसित कर रहे हैं। जल संरचनाओं की जियो-टैगिंग और नियमित निगरानी से काम की प्रगति पर भी नजर रखी जा रही है।

तीन चरणों में लगातार बेहतर प्रदर्शन

छत्तीसगढ़ ने ‘जल संचय जन भागीदारी’ के तीनों चरणों में मजबूत प्रदर्शन किया है। पहले चरण में 4 लाख 5 हजार 561 जल संरचनाएं बनाई गईं और प्रदेश दूसरे स्थान पर रहा।

दूसरे चरण में 24 लाख 7 हजार 456 जल संरचनाएं दर्ज की गईं। इनमें 23 लाख 7 हजार 768 का काम पूरा हो चुका है। इस चरण में भी छत्तीसगढ़ दूसरे स्थान पर रहा।

तीसरे चरण में 79 हजार 775 जल संरचनाएं दर्ज की गई हैं। इनमें 77 हजार 719 संरचनाओं का निर्माण पूरा हो चुका है। इसी प्रदर्शन के आधार पर प्रदेश को देश में पहला स्थान मिला है।

पांच जिलों ने भी बनाई जगह

राज्य के साथ उसके जिलों का प्रदर्शन भी उल्लेखनीय रहा। सूरजपुर, महासमुंद, बालोद, बलौदाबाजार-भाटापारा और कबीरधाम देश के शीर्ष 10 जिलों में शामिल हुए। इन जिलों में स्थानीय जरूरतों के अनुसार जल संरचनाओं के निर्माण के साथ ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ाई गई।

घटे पानी की कमी वाले ब्लॉक

जल संरक्षण अभियान के परिणामस्वरूप प्रदेश में पानी की कमी वाले ब्लॉकों की संख्या 26 से घटकर 19 हो गई है। पांच क्रिटिकल ब्लॉकों के भी सामान्य श्रेणी में आने का अनुमान है। भू-जल पुनर्भरण के साथ पुराने जल स्रोतों को बचाने, जल संरचनाओं की मैपिंग और नियमित निगरानी पर भी जोर दिया जा रहा है।

जहां पानी गिरे, वहीं रोकें’

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री के ‘कैच द रेन—जहां जल गिरे, वहीं सहेजें’ के संदेश को छत्तीसगढ़ ने स्थानीय परिस्थितियों के मुताबिक जमीन पर उतारा है। लक्ष्य है कि बारिश का अधिकतम पानी गांव और खेत की सीमा के भीतर रोका जाए। इससे भू-जल पुनर्भरण के साथ सिंचाई और पेयजल की उपलब्धता बेहतर करने में मदद मिल सकती है।

राज्यों की अलग रणनीति जरूरी

मुख्यमंत्री ने सुझाव दिया कि देश के प्रत्येक राज्य के लिए उसकी भौगोलिक स्थिति और वर्षा के अनुरूप अलग ‘कैच द रेन प्लान’ होना चाहिए। उन्होंने जल संरक्षण में बेहतर काम करने वाले राज्यों को प्रोत्साहित करने के लिए ‘स्टेट वाटर अवार्ड्स’ शुरू करने की बात कही।

उन्होंने जल संरचनाओं की मैपिंग के लिए तकनीक के अधिक इस्तेमाल और मुख्य सचिव की अध्यक्षता में हर तीन महीने में अभियान की समीक्षा का सुझाव भी दिया।

देश में 31 मई 2027 तक दो करोड़ नई जल संरचनाएं बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। छत्तीसगढ़ का मानना है कि जल संरक्षण में सरकार, किसान, पंचायत और समाज की संयुक्त भागीदारी से इस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में तेजी लाई जा सकती है।