शिवधाम कोड़िया का ‘भुइं फोड़ शिवलिंग’: घुरूवा से ज्योतिर्लिंग तक आस्था की अद्भुत गाथा

दुर्ग–धमधा मार्ग पर स्थित स्वयंभू शिवलिंग, सावन और महाशिवरात्रि में उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब

शिवधाम कोड़िया का ‘भुइं फोड़ शिवलिंग’: घुरूवा से ज्योतिर्लिंग तक आस्था की अद्भुत गाथा

दुर्ग जिले के धमधा विकासखंड के ग्राम कोड़िया में स्थित ‘भुइं फोड़ शिव मंदिर’ आस्था, लोकविश्वास और इतिहास का अनोखा संगम है। जिला मुख्यालय से करीब 21 किलोमीटर दूर दुर्ग–धमधा मार्ग पर बसे इस शिवधाम में स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है, जिसके बारे में मान्यता है कि यह भूमि को चीरकर प्रकट हुआ और आज हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है।

ननकटठी/दुर्ग। छत्तीसगढ़ की लोककथा ‘घुरूवा के दिन बहुरथे’ को साकार करता ग्राम कोड़िया आज ‘शिवधाम कोड़िया’ के नाम से प्रसिद्ध है। जिस स्थान पर कभी गोबर और कचरा संग्रहित करने का गड्ढा था, वहीं आज भव्य ‘भुइं फोड़ शिव मंदिर’ श्रद्धालुओं के विश्वास का प्रतीक बनकर खड़ा है। मंदिर में स्थापित शिवलिंग किसी मानव द्वारा स्थापित नहीं, बल्कि स्वयं प्रकट माना जाता है। शिवलिंग पर प्राकृतिक रूप से ‘ॐ’ की आकृति उकेरी हुई दिखाई देती है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां सच्चे मन से की गई आराधना हर मनोकामना पूर्ण करती है।

  प्राकट्य की अद्भुत कथा

गांव के साहित्यकार डॉ. नीलकंठ देवांगन के अनुसार करीब ढाई से तीन सौ वर्ष पूर्व मालगुजारी शासनकाल में गांव में पेयजल संकट उत्पन्न हुआ। ग्रामीणों ने दाऊ रूपसिंह वर्मा से कुआं खुदवाने का आग्रह किया। चयनित स्थान पर जब खुदाई शुरू हुई तो घुरूवा के गड्ढे में भूरे-लाल रंग का नारियलाकार पत्थर मिला, जिसे निकालने के सभी प्रयास असफल रहे। स्थानीय जानकारों ने इसे दिव्य प्रतीक माना।

बाद में समीप ही कुआं खोदा गया, जो वर्षों तक गांव का मुख्य जलस्रोत रहा। इधर उस पत्थर पर जल चढ़ाकर पूजा-अर्चना शुरू हुई और समय के साथ उसका आकार बढ़ने लगा। शिवलिंग की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। दाऊ रूपसिंह वर्मा ने वहां एक छोटा मंदिर बनवाया, जो आगे चलकर आस्था का केंद्र बन गया।

  पुनर्निर्माण से भव्य स्वरूप

समय के साथ पुराना मंदिर जर्जर हो गया। ग्रामीणों ने 1995 में पुनर्निर्माण समिति गठित कर चंदा एकत्रित किया। वर्ष 2005 में भव्य मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ। प्रारंभिक निर्माण कार्य गांव के मिस्त्री नारायण निर्मल ने किया, जबकि प्रसिद्ध वास्तुशिल्पी पोखराज पैरी ने अंतिम स्वरूप दिया। भित्ति चित्रों और कलाकृतियों को पेंटर इतवारी ने सजीव रंगों से सजाया।

 आकर्षक प्रतिमाएं और मनोहारी चित्रांकन

मंदिर परिसर में राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती-कार्तिकेय, गणेश, हनुमान, लक्ष्मी-नारायण, सरस्वती, राम-जानकी-लक्ष्मण, नरसिंहनाथ और जगन्नाथ की आकर्षक प्रतिमाएं स्थापित हैं। गर्भगृह में शिवलिंग अपने मूल स्थान पर विराजमान है, जबकि द्वार, जल निकासी और परिक्रमा पथ को आधुनिक सुविधाओं के अनुरूप विकसित किया गया है। अंदर सूर्य प्रभा की आकृति में जड़े कांच, काष्ठ निर्मित द्वार और चतुर्भुज-अष्टकोणीय दीवारों पर उकेरे गए भित्ति चित्र श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।

 सावन और महाशिवरात्रि में उमड़ती है भीड़

सावन मास में विशेषकर सोमवार को यहां श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं। बड़ी संख्या में कांवरिये जलाभिषेक करने पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर तो यहां विशाल मेला लगता है और कई दिनों तक धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। दूर-दराज से श्रद्धालु ‘भुइं फोड़ शिवलिंग’ के दर्शन और अभिषेक के लिए आते हैं।

 आस्था से पहचान बना ‘शिवधाम कोड़िया’

आज यह गांव केवल कोड़िया नहीं, बल्कि ‘शिवधाम कोड़िया’ के नाम से जाना जाता है। घुरूवा से ज्योतिर्लिंग तक की यह यात्रा न केवल लोकविश्वास की कहानी है, बल्कि ग्रामीण आस्था, एकजुटता और सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत उदाहरण भी है।