कोर्ट का आदेश लेकर पहुंचे कुलसचिव, अपने ही दफ्तर में नहीं मिला प्रवेश
हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी पदभार पर असमंजस; भूपेंद्र कुलदीप के कक्ष में ताला, वकील ने अवमानना की कार्रवाई की चेतावनी दी
दुर्ग-भिलाई। हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में कुलसचिव की नियुक्ति और पदभार को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। उच्च शिक्षा संचालनालय, रायपुर में अटैच किए जाने के शासन के आदेश को हाईकोर्ट से निरस्त कराने के बाद भूपेंद्र कुलदीप 9 अक्टूबर को विश्वविद्यालय में ज्वाइनिंग देने पहुंचे। लेकिन जिस कार्यालय में उन्हें पदभार संभालना था, उसी पर ताला लगा हुआ था। न्यायालय के आदेश की प्रति सौंपने के बाद भी वे अपने कक्ष में प्रवेश नहीं कर सके।
दिनभर चली इस स्थिति के बीच विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. संजय तिवारी मौजूद नहीं रहे। प्रभारी कुलसचिव डॉ. अनिल कुमार पांडेय के भी अवकाश पर होने की जानकारी मिली। नतीजतन, कुलदीप की ज्वाइनिंग को लेकर तत्काल कोई समाधान नहीं निकल सका। अब उनके अधिवक्ता शशिकांत चौहान ने मामले को हाईकोर्ट में ले जाने की तैयारी की है। उनका कहना है कि सोमवार को अवमानना याचिका दायर की जा सकती है।
29 सितंबर के आदेश पर अदालत ने लगाई कानूनी रोक
विवाद की शुरुआत उच्च शिक्षा विभाग के 29 सितंबर 2026 के आदेश से हुई थी। इस आदेश के तहत कुलसचिव भूपेंद्र कुलदीप को हेमचंद यादव विश्वविद्यालय से हटाकर उच्च शिक्षा संचालनालय, रायपुर में अटैच किया गया था। उनकी जगह दुर्ग साइंस कॉलेज के इतिहास विभाग के प्राध्यापक डॉ. अनिल कुमार पांडेय को प्रभारी कुलसचिव बनाया गया।
कुलदीप ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति विभु दत्त गुरु की एकलपीठ ने शासन के आदेश को निरस्त कर दिया। अदालत के समक्ष शासन यह स्पष्ट नहीं कर सका कि विश्वविद्यालय के कुलसचिव को उच्च शिक्षा संचालनालय में अटैच करने का अधिकार किस विशिष्ट कानूनी प्रावधान के तहत दिया गया है।
नियमों के दायरे में ही इस्तेमाल हो सकता है अधिकार
राज्य सरकार ने सुनवाई में सेवा नियमों में वर्ष 1999 में किए गए संशोधन का हवाला दिया था। शासन का तर्क था कि स्थानांतरण का अधिकार राज्य सरकार को प्राप्त है। कुलदीप के खिलाफ विभागीय जांच लंबित होने के कारण उन्हें स्थानांतरित करने के बजाय अटैच किया गया था।
हालांकि, अदालत ने इस दलील को पर्याप्त नहीं माना। न्यायालय के अनुसार, स्थानांतरण का अधिकार होने के बावजूद सरकार को निर्धारित सेवा नियमों का पालन करना अनिवार्य है। विश्वविद्यालय सेवा नियमों के तहत एक विश्वविद्यालय से दूसरे विश्वविद्यालय में स्थानांतरण का प्रावधान हो सकता है, लेकिन उच्च शिक्षा संचालनालय को विश्वविद्यालय के समान मानकर वहां पदस्थ करने का स्पष्ट आधार पेश नहीं किया गया।
अदालत ने यह भी माना कि विभागीय जांच लंबित होने मात्र से नियमों के बाहर जाकर आदेश जारी करने का अधिकार नहीं मिल जाता। इसी आधार पर कुलदीप की याचिका स्वीकार कर अटैचमेंट आदेश निरस्त कर दिया गया। हालांकि, शासन को कानून के अनुरूप नया आदेश जारी करने की स्वतंत्रता दी गई है।
ज्वाइनिंग नहीं होने पर अदालत जाने की तैयारी
हाईकोर्ट से आदेश निरस्त होने के बाद कुलदीप अपने पद पर लौटने की प्रक्रिया पूरी करने विश्वविद्यालय पहुंचे थे। लेकिन कक्ष बंद होने के कारण वे ज्वाइनिंग नहीं कर सके। उनके अधिवक्ता का कहना है कि शासन के आदेश के निरस्त होने के बाद उसके आधार पर पदभार ग्रहण करने से रोकना न्यायालय के आदेश की अवहेलना का विषय बन सकता है।
अधिवक्ता शशिकांत चौहान ने चेतावनी दी है कि यदि कुलदीप को पदभार संभालने का अवसर नहीं दिया गया, तो सोमवार को अवमानना याचिका दायर की जाएगी। हालांकि, अवमानना का प्रश्न अदालत के आदेश की वास्तविक शर्तों और विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्रवाई के आधार पर तय होगा।
विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी से बढ़ी अनिश्चितता
इस पूरे घटनाक्रम में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कार्यालय बंद रखने का स्पष्ट कारण सामने नहीं आया है। कुलपति और प्रभारी कुलसचिव की अनुपस्थिति के बीच कुलसचिव का अपने ही कार्यालय में प्रवेश नहीं कर पाना प्रशासनिक समन्वय पर सवाल खड़े करता है।
अब आगे की स्थिति इस बात पर निर्भर करेगी कि विश्वविद्यालय प्रशासन हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में क्या कदम उठाता है और शासन की ओर से कोई नया आदेश जारी किया जाता है या नहीं। फिलहाल कुलसचिव की ज्वाइनिंग का मामला कानूनी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है।
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